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पाठ सलात का तरीक़ा
:एक और छात्र गिनें जिस ने इस पाठ को पूरा किया है
1- नीयत
सलात के लिए खड़ा हो कर “अल्लाहु अक्बर” कहे, और अपने हाथों की उंगलीयों को फैला कर और हथेलीयों को क़िब्ला की ओर करते हुये अपने दोनों हाथों को कंधों तक या कानों के लौ के बराबर तक उठाये।
तक्बीर का अर्थ
3- तक्बीर के बाद अपना दायाँ हाथ बायाँ हाथ पर रख कर अपने सीने पर रखे। और हालते क़ियाम (खड़ा रहने की अवस्था) में हमेशा ऐसा ही करे।
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मुस्लिम पर यह सूरह याद करना वाजिब है, क्योंकि सलात में इस का पढ़ना रुक्न है उस व्यक्ति पर जो अकेले नमाज़ पढ़े या जमाअत के साथ मुक़्कदी बन कर ऐसी नमाज़ पढ़े जिस में इमाम आवाज़ के साथ क़िराअत नहीं करते हैं।
सूरह फ़ातिहा
10- फिर पहली तक्बीर की तरह हथेलीयों को क़िब्ला की ओर करते हुये अपने दोनों हाथों को कंधों तक या उस के ऊपर तक उठा कर अल्लाहु अक्बर कहते हुये रुकू करे।
11- अपनी पीठ को क़िब्ला की ओर झुका कर, नीज़ अपनी पीठ और सिर को सपाट रखते हुये और अपने हाथों को -उंगलीयाँ फैला कर- अपने घुटनों पर रख कर रुकू करे। और पढ़ेः “सुब्हान रब्बियल् अज़ीम” यानी “पाक है मेरा रब जो बड़ी अज़मत वाला है”। इस तस्बीह को तीन मरतबा पढ़ना मुस्तहब है, और एक मरतबा पढ़ना वाजिब है। और रुकू अल्लाह की अज़मत व बड़ाई तथा महिमा व महानता का स्थान है।
“सुब्हान रब्बियल् अज़ीम” का अर्थ यह है कि मैं कमीयों से महान अल्लाह की पाकी व पवित्रता बयान करता हूँ। और नमाज़ी इसे रुकू की हालत में कहेगा।
हथेलीयों को क़िब्ला की ओर करते हुये अपने दोनों हाथों को कंधों के बराबर उठा कर -अगर अकेले नमाज़ पढ़ने वाला हो या इमाम हो तो- कहेः “समिअल्लाहु लिमन् हमिदह” यानी “सुन ली अल्लाह ने उस की जिस ने उस की तारीफ़ की”। और फिर सारे लोग कहें “रब्बना व लकल् हम्द” यानी “ऐ हमारे रब! तेरे ही लिए तारीफ़ है”।
और मुस्तहब है कि “रब्बना व लकल् हम्द” के साथ बढ़ा कर कहेः “--- हम्दन् कसीरन् तैइबन् मुबारकन् फ़ीह, मिल्अस्समावाति वल्अर्ज़ि व मिल्अ मा शि’त मिन् शैइम् बा’दु” यानीः बहुत ज़्यादा, पाकीज़ा, बाबरकत तारीफ़, आसमानों तथा ज़मीन के बराबर और जो कुछ तू इस के बाद चाहे उस के बराबर”।
13- इस के बाद तक्बीर कहते हुये सज्दा के लिए ज़मीन पर गिर पड़े, और सात अंगों -नाक समेत पेशानी, दोनों हाथों, दोनों घुटनों और दोनों पैरों- पर सज्दा करे। और उस के लिए सज्दे में मुस्तहब है कि अपने दोनों हाथों को पहलूओं (भुजाओं) से, पेट को दोनों रानों (जांघों) से, और दोनों रानों को दोनों पैरों से दूर रखे। नीज़ दोनों बाज़ूओं को ज़मीन से उठाये रखे।
सज्दा अल्लाह तआला से दुआ करने के लिए सब से महान स्थानों में से एक है। अतः मुस्लिम वाजिब ज़िक्र के बाद उस में दुनिया व आख़िरत की भलाई में से जो चाहे मांगे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “बंदा अपने रब के सब से ज़्यादा क़रीब उस वक़्त होता है जब वह सज्दे में होता है, लिहाज़ा तुम (सज्दे में) ख़ूब दुआ किया करो।” {मुस्लिमः 482}
15- फिर कहे “अल्लाहु अक्बर”, और दो सज्दे के दरमियान बैठे। और उस के लिए मुस्तहब है कि अपने बायें पैर पर बैठे और दायें पैर को खड़ा रखे, तथा अपने दोनों हाथों को रानों के अगले भाग पर रखे जो कि घुटनों से मुत्तसिल है।
सलात में बैठने का तरीक़ा
16- दोनों सज्दे के दरमियान की बैठक में कहेः “रब्बिग़फ़िर् ली” यानी “ऐ मेरे रब! मुझे माफ़ कर दे”। और इसे तीन बार दोहराना मुस्तहब है।
17- फिर अपने पहले सज्दा की तरह दूसरा सज्दा करे
18- फिर “अल्लाहु अक्बर” कहते हुये दूसरे सज्दा से क़ियाम की स्तिथि की ओर उठे।
19- और दूसरी रकअत बिल्कुल पहली रकअत की तरह पढ़े।
20- दूसरी रकअत में दूसरे सज्दा के बाद दोनों सज्दे के दरमियान बैठने की तरह से तशह्हुद के लिए बैठे। और अपने दायें हाथ की शहादत उँगली से क़िब्ला की सिम्त इशारा करे। और पढ़ेः “अत्तहिय्यातु लिल्लाहि वस्सलवातु वत्तैइबातु, अस्सलामु अलैक अय्युहन्नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु, अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस् सालिहीन, अशहदु अल्ला इलाह इल्लल्लाहु, व अशहदु अन्न मुहम्मदन् अब्दुहु व रसूलुहु” यानी “सारी ज़ुबानी, बदनी और माली इबादतें सिर्फ़ अल्लाह के लिए हैं। ऐ नबी! आप पर सलामती नाज़िल हो, और अल्लाह की रहमतें तथा उस की बरकतें अवतारित हो। और सलामती हो हम पर और अल्लाह के नेक बंदों पर। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूजने योग्य नहीं है, और गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उस के बंदे तथा उस के रसूल हैं”।
22- फिर आख़िरी रकअत में दूसरे सज्दा के बाद आख़िरी तशह्हुद के लिए बैठे। आख़िरी तशह्हुद का तरीक़ा यह है कि अपने सुरीन पर बैठे और दाहने पैर को खड़ा करे तथा उस के नीचे से बायें पैर को निकाले। और इस में वह सब पढ़े जो उस ने पहले तशह्हुद में पढ़ा था। फिर दुरूदे इब्राहीमी पढ़ेः “अल्लाहुम्म सल्लि अला मुहम्मदिँव व अला आलि मुहम्मदिन् कमा सल्लैत अला इब्राहीम व अला आलि इब्राहीम इन्नक हमीदुम्मजीद। व बारिक अला मुहम्मदिँव व अला आलि मुहम्मदिन् कमा बारक्त अला इब्राहीम व अला आलि इब्राहीम इन्नक हमीदुम्मजीद” यानीः “ऐ अल्लाह! रहमत भेज मुहम्मद पर और मुहम्मद के आल (परिवार) पर जैसे रहमत भेजी तू ने इब्राहीम पर और इब्राहीम के आल पर, बेशक तू बुज़ुरगी और तारीफ़ के लायक़ है। और बरकत भेज मुहम्मद पर और मुहम्मद के आल पर जैसे बरकत भेजी तू ने इब्राहीम पर और इब्राहीम के आल पर, बेशक तू बुज़ुरगी और तारीफ़ के लायक़ है”।
23- फिर दायें ओर मुड़ते हुये कहेः “अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह, फिर बायें ओर मुड़ते हुये इसी तरह कहे। और सलाम फेरने के बाद मुस्लिम अपनी सलात से फ़ारिग़ हो जाता है, जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “पहली तक्बीर के साथ सलात में दाख़िल होना है और सलाम के ज़रीया उस से निकलना है”। {अबू दाऊदः 618, तिर्मिज़ीः 3}
24- फ़र्ज़ सलात से सलाम फेरने के बाद पढ़ना मुस्तहब हैः
उस के लिए ज़रूरी है कि अरबी में सूरह फ़ातिहा याद करने की बे इंतिहा (अत्याधिक) कोशिश करे, क्योंकि इस के बग़ैर सलात सही-शुद्ध नहीं होती। और इसी तरह यह भी ज़रूरी है कि वह उन वाजिब अज़कार को याद करने की कोशिश करे। और वह हैःं सूरह फ़ातिहा, तक्बीर, सुब्हान रब्बियल् अज़ीम, समिअल्लाहु लिमन् हमिदह, रब्बना लकल् हम्द, सुब्हान रब्बियल् आला, रब्बिग़फ़िर् ली, अत्तहिय्यातु लिल्लाहि ---, अल्लाहुम्म सल्लि अला मुहम्मद ---, अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह।
सलात के अज़कार का हिफ़्ज़ मुकम्मल होने से पहले तक मुस्लिम को चाहिये कि दौराने सलात तस्बीह (सुब्हानल्लाह), तहमीद (अल्हम्दु लिल्लाह) और तक्बीर (अल्लाहु अक्बर) में से जो उसे मालूम है उसे दोहराता रहे, या क़ियाम के दौरान उस आयत को रीपिट करता रहे जो उसे याद है। क्योंकि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः (فَاتَّقُوا الله مَا اسْتَطَعْتُمْ) (التغابن: 16). “पस जहाँ तक तुम से हो सके अल्लाह से डरते रहो।” {अत्तग़ाबुनः 16}
इस अवधि में उसे सामर्थ्य अनुसार जमाअत के साथ सलात अदा करने पर पूर्ण उत्सुक रहना चाहिये, ताकि वह अपनी सलात को नियंत्रित कर सके, और इस लिए भी कि इमाम मुक़्तदीयों की कुछ कमियों को तहम्मुल करते हैं।