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पाठ गवाही देना कि अल्लाह के अलावा कोई सत्य माबूद नहीं

इस्लाम ने शहादतैन “अशहदु अल्ला इलाह इल्लल्लाह व अशहदु अन्न मुहम्मदर् रसूलुल्लाह” को सब से ऊँचे मक़ाम और महान मर्यादा व रुत्बे से नवाज़ा है। आप इस पाठ में “ला इलाह इल्लल्लाह” की गवाही देने के अर्थ तथा उस के मक़ाम व मर्तबा और उस के अर्कान के संबंध में जानकारी प्राप्त करेंगे।

• “ला इलाह इल्लल्लाह” की गवाही देने के अर्थ की जानकारी।• “ला इलाह इल्लल्लाह” की गवाही देने के मक़ाम व मर्तबा की जानकारी।• “ला इलाह इल्लल्लाह” की गवाही देने के अर्कान की जानकारी।

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इस्लाम ने कलिमा तौहीद ला इलाह इल्लल्लाह को सब से ऊँचे मक़ाम और महान मर्यादा व रुत्बे से नवाज़ा है।

ला इलाह इल्लल्लाह का मकाम व मर्यादा

١
यह मुस्लिम का सब से पहला फर्ज (कर्तव्य) है, अतः जो शख्स इस्लाम में प्रवेश करना चाहे उस पर जरूरी है कि वह इस का एतिकाद (आस्था) रखते हुए इसे अपनी जुबान से उच्चारण (तलफ्फुज) करे।
٢
जो व्यक्ति ईमान व यकीन के साथ इसे पढ़ेगा तो यह उस के लिए जहन्नम से नजात का ज़रीया होगा। जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “बेशक अल्लाह ने जहन्नम की आग पर उस व्यक्ति को हराम कर दिया जिस ने अल्लाह की रिज़ा के लिए कहाः ला इलाह इल्लल्लाह।” {बुख़ारीः 425, मुस्लिमः 33}
٣
जिस शख़्स की मौत ईमान की हालत में इस कलिमा पर हो, तो वह जन्नतीयों में से है। जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “जिस की मौत इस हाल में हो कि वह जानता है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं तो वह जन्नत में दाख़िल होगा।” {अहमदः 464}

इसी लिए ला इलाह इल्लल्लाह की गवाही सब से महान फ़र्ज़ तथा महत्वपूर्ण दायित्व है।

ला इलाह इल्लल्लाह अर्थः

अर्थात नहीं है कोई सत्य माबूद मगर अकेला अल्लाह। पस इस में अल्लाह के अलावा सारी चीज़ों की इबादत व उपासना का इंकार है, और उस की तमाम क़िस्मों को केवल उस अकेले अल्लाह के लिए साबित करना है जिस का कोई शरीक व साझी नहीं है।

इलाहः उस माबूद के अर्थ में है जिस के लिए दिल विनम्र व विनयी हो कर उस की ताज़ीम करते हैं, उस को पुकारते हैं, उस से डरते और उस से उम्मीद रखते हैं। अतः जो व्यक्ति किसी चीज़ के लिए विनम्र व विनयी हुआ और उस से महब्बत किया तथा उस से उम्मीद रखा, तो उस ने उस को इलाह और माबूद बना लिया। और यह तमाम माबूदान (उपास्य) बातिल हैं, सिवाय एक माबूद के, और वह हैः ख़ालिक़ व मालिक (स्रष्टा व प्रभु) अल्लाह तबारक व तआला।

पस दूसरों के अलावा एकमात्र अल्लाह सुब्हानहु व तआला ही इबादत का हक़दार है। और वही ज़ात है दिल जिस की इबादत करते हैं, महब्बत और सम्मान व ताज़ीम करते हुये, नमन और नम्रता का प्रदर्शन करते हुये, ख़ौफ़ खाते हुये, उस पर भरोसा रखते हुये और उसी को पुकारते हुये। क्योंकि नहीं पुकारा जायेगा मगर अल्लाह को, फ़रयाद नहीं की जायेगी मगर उसी से, भरोसा नहीं किया जायेगा मगर उसी पर, नमाज़ नहीं पढ़ी जायेगी मगर उसी के लिए और तक़र्रुब (निकटता) की ग़रज़ से ज़बह नहीं किया जायेगा मगर उसी के लिए। अतः उसी के लिए इबादत का ख़ालिस करना वाजिब और ज़रूरी है। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः “उन्हें इस के सिवा कोई हुक्म नहीं दिया गया कि वह अल्लाह ही के लिए दीन को ख़ालिस रखते हुये सिर्फ़ उसी की इबादत करें।” {अलबैइनाः 4}

और जो व्यक्ति इख़्लास के साथ और ला इलाह इल्लल्लाह के अर्थ को वास्तव रूप देते हुये (हक़ीक़त का जामा पहनाते हुये) अल्लाह की इबादत करे, वह अज़ीम सआदत (विशाल सौभाग्य), प्रफुल्लता तथा सुख शांति और उदार व पाकीज़ा ज़िंदगी हासिल करेगा। क्योंकि दिलों के लिए हक़ीक़ी उन्स व महब्बत और शांति व राहत नहीं हैं मगर सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह तआला की इबादत में। जैसा कि उस का इरशाद हैः “जो शख़्स नेक अमल करे, मर्द हो या औरत लेकिन मुमिन हो तो हम उसे यक़ीनन निहायत बेहतर ज़िंदगी अता फ़रमायेंगे।” {अन्नहलः 97}

ला इलाह इल्लल्लाह के अर्कान

١
पहला रुक्नः (ला इलाह) है, यानी ग़ैरुल्लाह के लिए इबादत को नकारना तथा शिर्क को बातिल क़रार देना है, और हर उस चीज़ के साथ कुफ़्र करना वाजिब है जो अल्लाह के अलावा पूजे जाते हैं, चाहे वह इंसान हूँ या जानवर, मूर्ती हूँ या सितारे या इन के सिवा कोई और हो।
٢
दूसरा रुक्नः (इल्लल्लाह) है, और वह एक अल्लाह के लिए इबादत को साबित करना है, और तमाम क़िस्म की इबादतों -जैसे नमाज़, दुआ, तवक्कुल आदि- को एक अल्लाह के लिए करना है।

इबादत की तमाम क़िस्में केवल उस अकेले अल्लाह के लिए सर्फ़ की जायेंगी जिस का कोई शरीक व साझी नहीं है। अतः जिस ने कोई भी इबादत ग़ैरुल्लाह (अल्लाह के अलावा) के लिए सर्फ़ किया तो उस ने अल्लाह के साथ शिर्क किया। जैसा कि उस का इरशाद हैः “जो शख़्स अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद को पुकारे जिस की कोई दलील उस के पास नहीं, पस उस का हिसाब तो उस के रब के ऊपर ही है। बेशक काफ़िर लोग नजात से महरूम हैं।” {अलमुमिनूनः 117}

ला इलाह इल्लल्लाह के अर्थ और उस के अर्कान का ज़िक्र अल्लाह तआला के इस फ़रमान में आया हैः (فَمَنْ يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ وَيُؤْمِنْ بِاللهِ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَى) (البقرة: 256). “पस जो शख़्स अल्लाह के सिवा दूसरे माबूदों का इंकार कर के अल्लाह पर ईमान लाये उस ने मज़बूत कड़े को थाम लिया।” {अलबक़राः 256} अल्लाह का फ़रमानः (فَمَنْ يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ) यानी “पस जो शख़्स अल्लाह के सिवा दूसरे माबूदों का इंकार करे” पहले रुक्न (ला इलाह) का अर्थ है। और उस का फ़रमानः (وَيُؤْمِنْ بِاللهِ) यानी “और अल्लाह पर ईमान लाये” दूसरे रुक्न (इल्लल्लाह) का अर्थ है।

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