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पाठ जिंदगी और मौत की हक़ीक़त
मृत्यु मामले का अंत नहीं है, बल्कि मनुष्य के लिए एक नया चरण है और एक पूर्ण जीवन की शुरुआत है। जिस तरह इस्लाम जन्म से अधिकारों की रक्षा करने के लिए उत्सुक है, उसी तरह उस ने उन प्रावधानों पर जोर दिया जो मृतकों के अधिकारों को संरक्षित करते हैं और उन के परिवार और रिश्तेदारों की स्थिति को ध्यान में रखते हैं।
अल्लाह तआला ने हमें पैदा फ़रमाया और हमें इस सांसारिक जीवन में ईजाद किया ताकि वह हमें आज़माये और हमारा इम्तिहान ले। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः “जिस ने मौत और हयात को इस लिए पैदा किया कि तुम्हें आज़माये कि तुम में से अच्छे काम कौन करता है।” {अल-मुल्कः 2} पस जो कोई ईमान लाए और डरे, वह जन्नत में दाखिल होगा, और जो कोई गुमराही और भटकाव को अपनाये, वह जहन्नम में दाखिल होगा।
और इस जीवन में व्यक्ति का जीवन, चाहे वह कितना भी लंबा क्यों न हो, परिमित और क्षणिक है, और स्थायित्व, हमेशगी और अनन्त जीवन परलोक में है। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः “और सच्ची ज़िंदगी तो आख़िरत का घर है, काश यह जानते होते।” {अल-अंकबूतः 64}
और अल्लाह तआला ने अपनी सर्वश्रेष्ठ सृष्टि -हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा कि वह मर जाएगा जैसे लोग मरते हैं, फिर सभी अल्लाह के पास इकट्ठा होंगे ताकि वह उन के दरमियान फ़ैसला करे। “यक़ीनन ख़ुद आप को भी मौत का मज़ा चखना है और यह सब भी मरने वाले हैं। फिर तुम सब के सब क़ियामत के दिन अपने रब के सामने झगड़ोगे।” {अज़्ज़ुमरः 30-31}
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी स्थिति -और हर इंसान की स्थिति- की आख़िरत की तुलना में दुनिया और उस की संक्षिप्तता के साथ तशबीह दी है उस यात्री के मामले के साथ जिस ने आराम की ग़र्ज़ से किसी वृक्ष की छाया में कुछ देर सो गया फिर उस को छोड़ कर चल दिया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “मुझे दुनिया से क्या सरोकार? मैं तो दुनिया में उस सवार की तरह हूँ जो दरख़्त के नीचे साया हासिल करने के लिए ठहरा, फिर चल पड़ा और उस दरख़्त को छोड़ दिया।” {तिर्मिज़ीः 2377, इब्नु माजाः 4109}
जैसा कि अल्लाह तआला ने हमारे लिए याकूब अलैहिस्सलाम की वसीयत -जो उन्हों ने अपने बेटों से की थी- का ज़िक्र करते हुये फ़रमायाः “बेशक अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए इस दीन को पसंद फ़रमा लिया है, ख़बरदार! तुम मुसलमान हो कर ही मरना।” {अल-बक़राः 132}
और जब कोई मौत के समय और स्थान से वाक़िफ़ नहीं है जिसे अल्लाह ने उस के लिए मुक़द्दर व मुक़र्रर फ़रमा दिया है, और वह उस में हेरा फेरी करने का मालिक भी नहीं है, तो ऐसी सूरत में बुद्धिमान व्यक्ति को अपने दिनों और घंटों को भलाई, नेकी और दीनदारी से भरना चाहिए। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमायाः “और हर उम्मत के लिए निर्धारित समय है, पस जब उन का निर्धारित समय आ जायेगा, उस वक़्त एक लम्हा न पीछे हट सकेंगे और न आगे बढ़ सकेंगे।” {अल-आराफ़ः 34}
और हर वह शख़्स जिस के शरीर से उस की आत्मा के निकलने से मर जाता है, उस की क़ियामत शुरू हो जाती है, और दारे आख़िरत (परलोक) में अपनी यात्रा शुरू कर देता है, जिस का संबंध अदृश्य के ज्ञान से है, लिहाज़ा मानव मन (बशरी अक़्ल) के लिए विस्तार से उन की कैफ़ीयत की जानकारी मुमकिन नहीं है।
जिस तरह शरीअत ने मनुष्य के जन्म से ले कर उस के पालन-पोषण, बचपन, जवानी और बुढ़ापा तक के प्रावधानों और नैतिकताओं (अहकाम व आदाब) का ख़्याल रखा है, उसी तरह उस ने हमारे लिए उन प्रावधानों और नैतिकताओं को कानून बनाया है जो मृतकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं, और उन के परिवार और रिश्तेदारों की स्थिति को ध्यान में रखते हैं। पस स्तुति है उस अल्लाह की जिस ने धर्म को पूर्ण किया, नेमतों को मुकम्मल फ़रमाया और हमें इस महान धर्म की ओर हिदायत दी।
जो व्यक्ति किसी बीमार की ज़ियारत के लिए जाये, उसे उस के ठीक होने और स्वस्थ होने के लिए दुआ करनी चाहिए, और यह कि उस की यह बीमारी पापों की शुद्धि और गुनाहों की माफ़ी का ज़रीया बने। जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बीमार के लिए यूँ दुआ फ़रमातेः "لا بأس، طهور إن شاء الله" “कोई फ़िक्र नहीं, अल्लाह ने चाहा तो यह बीमारी गुनाहों से पाक करने वाली है।” {बुख़ारीः 3616}
और उसे उन शब्दों और वाक्यांशों का चयन करना चाहिये जो रोगी को बीमारी का मुक़ाबला करने और ठीक होने में सहायता करें। नीज़ अल्लाह की ओर बुलाने के लिए उपयुक्त परिस्थितियों का लाभ उठाते हुये बीमार को हिक्मत और अच्छे उपदेश के साथ अल्लाह और अंतिम दिन की याद दिलाना चाहिये। और इस के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सब से बड़ा उदाहरण पेश फ़रमाया है। अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक यहूदी लड़का था जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़िदमत किया करता था। वह बीमार हो गया तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस की तीमार दारी के लिए उस के पास तशरीफ़ ले गये। आप उस के सिरहाने बैठ गये और उस से फ़रमायाः “इस्लाम क़बूल कर ले।” उस ने (सवालिया नज़्रों से) अपने बाप की तरफ़ देखा जो उस के पास ही था। उस ने कहाः अबुल् क़ासेम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की बात मान ले। चुनांचि वह मुसलमान हो गया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह फ़रमाते हुये बाहर तशरीफ़ लायेः “तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिए हैं जिस ने इस लड़के को जहन्नम की आग से बचा लिया।” {बुख़ारीः 1356}
2. मृत्यु आसन्न व्यक्ति (मौत से क़रीब शख़्स) को उपदेश
यदि रोगी पर आसन्न मृत्यु और मृत्यु के लक्षण ज़ाहिर हो जायें, तो उसे उपदेश देना और कलिमा तौहीद (एकेश्वरवाद के शब्द) और स्वर्ग की कुंजी (ला इलाह इल्लल्लाह) को हिक्मत और उपयुक्त शैली के साथ कहने के लिए प्रोत्साहित करना वांछनीय है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “अपने मुर्दों को ला इलाह इल्लल्लाह पढ़ने की तलक़ीन करो।” {मुस्लिमः 916}
और यह सब से अज़ीम बात है जो कि व्यक्ति अपने जीवन में और अपनी मृत्यु के समय कहे। और जो इस तौफ़ीक़ से नवाज़ा गया कि यह उस का आख़िरी कलिमा है तो उस ने महान सम्मान प्राप्त किया। जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “जिस का आख़िरी कलाम ला इलाह इल्लल्लाह होगा वह जन्नत में जायेगा।” {अबू दाऊदः 3116}
मृत्यु आसन्न व्यक्ति को क़िबला रुख़ करना वांछनीय है। क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “अलबैतुल हराम तुम्हारे ज़िंदों और मुर्दों का क़िबला है।” {अबू दाऊदः 2875} लिहाज़ा मृत्यु आसन्न व्यक्ति को उस के दायें पहलू पर कर के क़िबला रुख़ कर दिया जाये जैसे लह्द में रख जाता है।
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