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पाठ क़ुरआने करीम का परिचय
क़ुरआने करीम
अल्लाह तआला ने मानव जाति का मार्गदर्शन करने और उन्हें अंधेरे से प्रकाश में लाने के लिए कुरआन को अपने सर्वश्रेष्ठ सृष्टि और अपने आख़िरी पैगंबर मुहम्मद पर उतारा। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः ﴿قَدْ جَاءَكُمْ مِنَ اللهِ نُورٌ وَكِتَابٌ مُبِينٌ * يَهْدِي بِهِ اللهُ مَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَهُ سُبُلَ السَّلامِ وَيُخْرِجُهُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ بِإِذْنِهِ وَيَهْدِيهِمْ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ﴾ [المائدة: 15، 16]. “तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से प्रकाश तथा खुली पुस्तक (क़ुरआन) आ गई है। जिस के द्वारा अल्लाह उन्हें शांति का मार्ग दिखा रहा है, जो उस की प्रसन्नता पर चलते हों, उन्हें अपने हुक्म से अंधेरों से निकाल कर प्रकाश की ओर ले जाता है और उन्हें सुपथ दिखाता है।” {अलमाइदाः 15-16}
कुरआने करीम की तारीफ़
क़ुरआने करीम: अल्लाह तआला का चमत्कारी शब्द (आजिज़ करने वाला कलाम) जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर नाज़िल किया गया, जिस की तिलावत इबादत है, और उस की शुरूआत सुरतुल फ़ातिहा से हुई, और सूरतुन्नास के साथ समाप्त हुआ।
पवित्र कुरआन के कई नाम हैं जो इस के सम्मान और फ़ज़ीलत को दर्शाते हैं। पस उस के नामों में सेः
पवित्र क़ुरआन का नुज़ूल (अवतरण)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर क़ुरआन सब से पहले शबे क़दर (सम्मानित रात्रि) में नाज़िल हुआ। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः ﴿إِنَّا أَنْزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةِ الْقَدْرِ﴾ (القدر: 1) “बेशक हम ने उसे शबे क़दर में उतारा।” {अलक़द्र 1} और फ़रमायाः ﴿شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدىً لِلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِنَ الْهُدَى وَالْفُرْقَانِ﴾ [البقرة: الآية 185]. “रमज़ान का महीना वह है जिस में क़ुरआन उतारा गया, जो सब लोगों के लिए हिदायत है, और मार्गदर्शन तथा (हक़ व बातिल के बीच) अंतर करने के खुले प्रमाण रखता है।” {अलबक़राः 185}
और अल्लाह के पास से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक क़ुरआने करीम को ले कर उतरने वाले जिब्रील अलैहिस्सलाम हैं जो सम्माननीय करीबी स्वर्गदूतों (मुकर्रम मुक़र्रब फ़रिश्तों) में से एक हैं। अल्लाह तआला ने क़ुरआन के संबंध में फ़रमायाः ﴿وَإِنَّهُ لَتَنْزِيلُ رَبِّ الْعَالَمِينَ (192) نَزَلَ بِهِ الرُّوحُ الْأَمِينُ (193) عَلَى قَلْبِكَ لِتَكُونَ مِنَ الْمُنْذِرِينَ (194) بِلِسَانٍ عَرَبِيٍّ مُبِينٍ ﴾ [الشعراء: 192- 195]. “तथा निःसंदेह यह (क़ुरआन) सारे जहान के पालनहार का उतारा हुआ है। इसे ले कर रूहुल अमीन (जिब्रील) उतरा। आप के दिल पर ताकि आप डराने वालों में से हो जायें। खुली अरबी ज़ुबान में।” {अश्शुअराः 192-195}
और क़ुरआने करीम की सब से पहली आयतें जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर नाज़िल हुईं, वह हैं सूरह अल-अलक की पहली पांच आयतें। और वह यह अल्लाह का फ़रमान हैः ﴿اقْرَأْ بِاسْمِ رَبِّكَ الَّذِي خَلَقَ (1) خَلَقَ الْأِنْسَانَ مِنْ عَلَقٍ (2) اقْرَأْ وَرَبُّكَ الْأَكْرَمُ (3) الَّذِي عَلَّمَ بِالْقَلَمِ (4) عَلَّمَ الْأِنْسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْ ﴾ [العلق: 1- 5]. “अपने उस पालनहार के नाम से पढ़ जिस ने पैदा किया। जिस ने इंसान को ख़ून के लोथड़े से पैदा किया। पढ़, और तेरा पालनहार बड़ा दया वाला है। जिस ने क़लम के ज़रीया सिखाया। इंसान को उस का ज्ञान दिया जिस को वह नहीं जानता था।” {अल-अलक़ः 1-5}
फिर क़ुरआन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर जस्ता जस्ता (थोड़ा थोड़ा), घटनाओं और तथ्यों के अनुसार, तेईस साल की अवधि में, अलग-अलग समय पर, मक्का और मदीना में नाज़िल होता रहा।
इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, उन्हों ने कहाः “क़ुरआन को क़दर की रात में एक बारगी सब से निचले आसमान में नाज़िल किया गया, फिर उस के बाद बीस वर्षों में नाज़िल किया गया।” {बैहक़ी रचित अलअस्मा वस्सिफ़ातः 497}
क़ुरआने करीम की सूरतें
क़ुरआने करीम की सूरतों की संख्या एक सौ चौदह (114) है, जिन में पहला अल-फ़ातिहा है और आख़िरी अन्नास है।
मक्की और मदनी सूरतें
क़ुरआने करीम के पारे तीस और उस के हिज़्ब साठ हैं।
कुरआन का लिखना और उसे इकट्ठा करना
कुरआन के लिखने और उसे इकट्ठा करने के तीन चरण हैं:
पहला चरण: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग के में
स्मृति की ताकत, याद करने की गति और लेखकों और लेखन के साधनों की कमी के कारण इस चरण में निर्भरता लेखन से अधिक याद रखने पर थी। इसी लिए इसे किसी मुसहफ़ में एकत्र नहीं किया गया था। बल्कि जिस ने कोई आयत सुनी, उस ने उसे कंठस्थ कर लिया, या जो कुछ भी उस के पास उपलब्ध था उस पर उसे उस ने लिख लिया, जैसे कि खजूर की टहनी, चमड़े के टुकड़े, पतले सफेद पत्थर के टुकड़े, और टूटी हुई टौड़ी हड्डीयाँ। और उस समय क़ुर्रा (पढ़ने वाले) बड़ी संख्या में थे।
दूसरा चरण: अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के युग में
हिज्रत के बारहवें वर्ष में, जब अल-यमामा की लड़ाई में बड़ी संख्या में हुफ़्फ़ाज़े क़ुरआन (क़ुरआन के हाफ़िज़) शहीद हो गए, तो अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने कुरआन के संग्रह करने का आदेश दिया ताकि यह नष्ट न हो जाए।
ज़ैद इब्ने साबित रज़ियल्लाहु अन्हु बयान फ़रमाते हैं किः (जब गियारह हिजरी में यमामा की लड़ाई में -जो मुसैलमा कज़्ज़ाब से हुई थी- बहुत से सहाबा मारे गये तो) अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुझे बुलाया, उस वक़्त उन के पास उमर रज़ियल्लाहु अन्हु भी मौजूद थे। उन्हों ने मुझ से कहाः उमर रज़ियल्लाहु अन्हु मेरे पास आये और कहा कि जंगे यमामा में बहुत ज़्यादा क़ुरआन के हाफ़िज़ लोग शहीद हो गये हैं। और मुझे ख़तरा है कि अगर इस तरह मुख़्तलिफ़ लड़ाइयों में क़ुरआन के हाफ़िज़ हज़रात शहीद होते रहे, तो क़ुरआन का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जायेगा। लिहाज़ा मेरी राय यह है कि आप क़ुरआन को जमा करने का हुक्म दें। (अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा) मैं ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से कहाः ऐसा काम मैं किस तरह कर सकता हूँ जो ख़ुद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नहीं किया। उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहाः अल्लाह की क़सम यह तो एक नेक काम है। इस के बाद उमर रज़ियल्लाहु अन्हु इस मामले में मुझ से बात करते रहे, यहाँ तक कि अल्लाह ने इस ख़िदमत के लिए मेरे सीने को भी खोल दिया, और मेरी भी राय वही हो गई जो उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की थी। ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहाः तुम जवान और समझदार हो, हमें तुम पर किसी क़िस्म का शुबह भी नहीं, और तुम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वह्य भी लिखा करते थे। इस लिए तुम ही क़ुरआन मजीद को मुख़्तलिफ़ जगहों से तलाश कर के उसे जमा कर दो। अल्लाह की क़सम अगर मुझे कोई पहाड़ उठा के ले जाने के लिए कहते तो यह मेरे उतना भारी नहीं था जितना क़ुरआन की तरतीब का हुक्म। मैं ने कहाः आप लोग एक ऐसे काम के करने पर किस तरह आमादा हो गये जिसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने नहीं किया। तो अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहाः अल्लाह की क़सम यह एक नेक काम है। इस के बाद अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु इस मामले में मुझ से बात करते रहे, यहाँ तक कि अल्लाह ने इस ख़िदमत के लिए मेरे सीने को भी खोल दिया, जिस के लिए अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के सीने को खोल दिया था। चुनांचि मैं ने खजूर की शाखों, खालों और हड्डीयों तथा लोगों के सीनों से जमा करना शुरू कर दिया --- पस मुसहफ़ वफ़ात तक अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के पास रहा, फिर आप की वफ़ात के बाद उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के पास महफ़ूज़ रहा, फिर हफ़्सा बिनते उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के पास। {बुख़ारीः 4986}
तीसरा चरणः उसमान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु के युग में
उसमान बिन अफ्फान रज़ियल्लाहु अन्हु के युग में इस्लामी राज्य के क्षेत्र का विस्तार हुआ, और हर देश के लोगों ने उन्हें पढ़ाने वाले सहाबीयों से कुरआन पढ़ने की विधि (तरीक़ा) ली। पवित्र कुरआन को पढ़ने के कई तरीकों (लहजों) को देखते हुए, फ़ितने की आशंका जताई गई, खास कर उन लोगों के लिए जिन्हों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कुरआने करीम नहीं सुना। इस लिए उसमान रज़ियल्लाहु अन्हु ने लोगों को एक मुसहफ़ पर इकट्ठा करने का आदेश दिया, ताकि लोग असहमत हो कर अल्लाह की किताब के बारे में झगड़ा न कर बैठें और तितर-बितर न हो जाएं।
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि हुज़ैफ़ा बिन यमान रज़ियल्लाहु अन्हु उसमान रज़ियल्लाहु अन्हु के पास आये, उस वक़्त आप अर्मीनीया और आज़रबीजान की फ़तह के सिलसिले में शाम के ग़ाज़ीयों के लिए जंग की तैयारीयों में मशग़ूल थे, ताकि वह इराक़ वालों को साथ ले कर जंग करें। हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहु अन्हु क़ुरआने मजीद की क़िराअत के इख़्तिलाफ़ की वजह से बहुत परेशान थे। उन्हों ने उसमान रज़ियल्लाहु अन्हु से कहाः ऐ अमीरुल मुमिनीन! इस से पहले कि यह उम्मत भी यहूदीयों और नसरानीयों की तरह अल्लाह की किताब में इख़्तिलाफ़ करने लगे, आप इस की ख़बर लीजिये। चुनांचि उसमान रज़ियल्लाहु अन्हु ने हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा के यहाँ कहलाया कि सहीफ़े हमें दे दें, ताकि हम उन्हें मुसहफ़ों में (किताबी शक्ल में) नक़ल करवा लें, फिर अस्ल हम आप को लौटा देंगे। हफ़्सा रजियल्लाहु अन्हा ने वह सहीफ़े उसमान रज़ियल्लाहु अन्हु के पास भेज दिये। और आप ने ज़ैद बिन साबित, अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर, सईद बिन आस और अब्दुर्रहमान बिन हारिस बिन हिशाम को हुक्म दिया और उन्हों ने इन सहीफ़ों को मुसहफ़ों में नक़ल कर लिये। {बुख़ारीः 4987}
कुरआन अब तक मुतवातिर तरीक़ा से (परम्परागत रूप से) उसी स्तिथि पर बाक़ी है जिस पर वह एकत्र किया गया था, और इस पर सारे मुसलमान सहमत व एकमत हैं।
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