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पाठ हज्ज का अर्थ और उस के फ़ज़ाएल
हज्ज का अर्थ
हज्ज यानी एक विशिष्ट समय पर मनासिक की अदाएगी के लिए अल्लाह के पवित्र घर काबा की ज़ियारत करना। और वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वारिद अफ़आल व अक़वाल का मजमूआ (आये हुये कर्मों और बातों की समष्टि) है, जैसेः एहराम करना, ख़ाना काबा का तवाफ़ करते हुये सात चक्कर लगाना, सफ़ा और मरवा दोनों पहाड़ीयों के दरमियान सई करते हुये सात चक्कर लगाना, अरफ़ा में अवस्थान करना और मिना में जमरात को कंकरीयाँ मारना वग़ैरा। और इस में बंदों के लिए अल्लाह की तौहीद की घोषणा करने, हाजीयों को प्राप्त होने वाली महान क्षमा, मुसलमानों के बीच एक-दूसरे को जानने, धर्म के नियमों को सीखने आदि बहुत लाभ हैं।
हज्ज का हुक्म
हज्ज इस्लाम के अर्कान में से पाँचवाँ रुक्न है, और वह हर मुसलमान मर्द व औरत पर जीवन में एक बार अगर वह सक्षम हों तो अनिवार्य है। अल्लाह तआला ने फ़रमायाः ﴿ وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ﴾ [آل عمران: 97]. “अल्लाह ने उन लोगों पर जो उस की तरफ़ राह पा सकते हों इस घर का हज्ज फ़र्ज़ कर दिया है। और जो कोई कुफ़्र करे तो अल्लाह तमाम दुनिया से बे परवा है।” {आलि इम्रानः 97}
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु बयान फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें ख़ुत्बा दिया तो फ़रमायाः “ऐ लोगो! अल्लाह ने तुम पर हज्ज फ़र्ज़ किया है, लिहाज़ा तुम हज्ज करो।” एक आदमी ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! क्या हर साल हज्ज करना फ़र्ज़ है? आप ख़ामूश रहे, यहाँ तक कि उस ने अपना सवाल तीन मरतबा दोहराया। तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “अगर मैं जवाब में हाँ कह देता तो यक़ीनन (हर साल) वाजिब हो जाता और तुम उस की ताक़त न रखते।” {मुस्लिमः 1337}
मुस्लिम पर वाजिब है कि वह हज्ज की अदाएगी की तरफ़ जल्दी करें जब उस के लिए सक्षमता सुनिश्चित हो जाये।
हज्ज का समय
हज्ज का समय और स्थान:
हज्ज का समय
हज्ज के लिए चंद महीने मुक़र्रर (निर्धारित) हैं, उन के अलावा किसी और महीना में हज्ज का इहराम करना सही नहीं है, और वह हैंः शव्वाल, ज़ुलक़दा और ज़ुलहिज्जा। हज्ज के आमाल ज़ुलहिज्जा के महीने के आठवें और तेरहवें दिन के बीच केंद्रित हैं, जो इस्लामी कैलेंडर में बारहवां चंद्र महीना है।
ये वह स्थान हैं जिन्हे बाहर से आने वाले किसी हज्ज या उम्रह करने वाले के लिए बिना इहराम के मक्का की ओर जाने की अनुमति नहीं है। पस मदीना वालों के लिए मिक़ात ज़ुलहुलैफा है, शाम के लोगों के लिए मिक़ात अल-जुहफा है, नजद के लोगों के लिए मिक़ात क़रनुल-मनाज़िल है, यमन के लोगों के लिए मिक़ात यलमलम है, और इराक के लोगों के लिए मिक़ात ज़ातु इर्क़ है। ये मवाक़ीत मज़कूरा लोगों के लिए हैं, साथ ही यह उन लोगों के लिए भी मीक़ात हैं जो वहाँ से गुज़रने वाले हैं, जो हज्ज या उम्रह करना चाहते हैं। और इन जगहों को अनुभवी लोगों और आधुनिक मानचित्रों के माध्यम से पहचाना जा सकता है।
हज्ज की शर्तें
पहली शर्तः मुस्लिम होना
मुस्लिम पर हज्ज फ़र्ज़ है। काफ़िर पर हज्ज फ़र्ज़ भी नहीं है, (और अगर वह करे तो) उस का हज्ज सही भी नहीं है। क्योंकि इबादत की शुद्धता के लिए इस्लाम शर्त है।
दूसरी शर्तः अक़्ल का होना
पागल पर हज्ज फ़र्ज़ भी नहीं है और उस से सही भी नहीं है। क्योंकि अक़्ल वाजिब होने तथा शुद्धता के लिए शर्त है। इस लिए कि हदीस में आया है, अली रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “तीन लोगों से क़लम उठा लिया गया है: सोने वाले से यहाँ तक कि वह जाग जाये, बच्चे से यहाँ तक कि वह बालिग़ हो जाये, और पागल से यहाँ तक कि उस को समझ आने लगे।” {अबू दाऊदः 4403}
तीसरी शर्तः बालिग़ होना
बच्चों पर हज्ज फ़र्ज़ नहीं है। इस लिए कि हदीस में आया है, अली रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “तीन लोगों से क़लम उठा लिया गया है: सोने वाले से यहाँ तक कि वह जाग जाये, बच्चे से यहाँ तक कि वह बालिग़ हो जाये, और पागल से यहाँ तक कि उस को समझ आने लगे।” {अबू दाऊदः 4403}
यदि कोई बच्चा हज्ज करता है, तो उस का हज्ज सही है, लेकिन यह उस के लिए इस्लाम के हज्ज की तरफ़ से पर्याप्त नहीं है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “अगर कोई बच्चा हज्ज करता है, तो यह उस के लिए हज्ज है यहाँ तक कि वह समझदार हो जाए, और जब वह समझदार हो जाए, तो उस पर दूसरा हज्ज है।” {मुस्तदरक हाकिमः 1769}
चौथी शर्तः आज़ाद होना
एक स्वामित्व वाले दास (ममलूक ग़ुलाम) पर हज्ज फ़र्ज़ नहीं है, वह अपने स्वामी (मालिक) की सेवा में व्यस्त रहने के कारण माज़ूर (उज़्रग्रस्त) है। और अगर वह अपने मालिक की अनुमति से हज्ज करता है, तो उस का हज्ज वैध है, लेकिन यह उस के लिए इस्लाम के हज्ज की ओर से पर्याप्त नहीं है। इस लिए कि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, उन्हों ने कहाः रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “और जो कोई दास हज्ज करता है और फिर वह आज़ाद हो जाता है, तो उस के ऊपर दूसना हज्ज है।” {बैहक़ी रचित अस्सुननुल कुबराः 8613}
पाँचवी शर्तः क्षमता
हज्ज उस क़ुदरत रखने वाले व्यक्ति पर अनिवार्य है, जो स्वस्थ है, यात्रा करने में सक्षम है, और उस के पास ख़र्चे तथा सवारी का इंतिज़ाम है, जिस के सहारे वह हज्ज करने के लिए जाने पर क़ादिर है। महिलाओं के हज्ज में साथ में महरम का होना सक्षमता के अंतर्गत है, क्योंकि उस के लिए बिना महरम के हज्ज के लिए सफ़र करना या दूसरे काम के लिए यात्रा करना जायज़ नहीं है।
अल्लाह तआला ने फ़रमायाः “अल्लाह ने उन लोगों पर जो उस की तरफ़ राह पा सकते हों उस घर का हज्ज फ़र्ज़ किया है।” {आलि इमरानः 97}
और जो कोई अपने पैसे से सक्षम हो, लेकिन शारीरिक रूप से ऐसी बीमारी हो, जिस के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, उस के कारण या बुढ़ापे के कारण अक्षम हो, उसे अपनी ओर से किसी को हज्ज करने के लिए सौंपना (प्रतिनिधि बनाना) चाहिए। फ़ज़्ल बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि एक आदमी ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछते हुये कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे पिता ने इस्लाम कबूल कर लिया और वह एक बूढ़ा आदमी है जो अपने ऊंट पर खड़ा नहीं हो सकता है, तो क्या मुझे उस की ओर से हज्ज करना चाहिए? आप ने फ़रमाया: "क्या आप को लगता है कि अगर उस पर कर्ज होता और उस की ओर से भुगतान करते, तो क्या यह उस के लिए पर्याप्त होता?" उस ने कहा: हाँ। आप ने फ़रमाया: "फिर अपने पिता की ओर से हज्ज करो।" {मुसनद अहमदः 1812}
मुस्लिम के लिए हज्ज करने की क्षमता की हालतें:
छठी शर्तः सफ़र में महिला के साथ किसी महरम का होना
महिला पर हज्ज फ़र्ज़ होने के लिए महरम का होना शर्त है, पस उस पर हज्ज फ़र्ज़ नहीं होगा मगर यह कि उस के साथ उस के महरमों -यानी उस का पति या वह लोग जिन के साथ हमेशा के लिए उस की शादी हराम है जैसेः बाप, दादा, बेटा, पोता, भाई, भतीजा, चचा और मामूँ- में से कोई महरम हो।
पस अगर महिला महरम के बिना ऐसे तरीक़ा से हज्ज करती जिस में वह अपने आप को मामून व महफ़ूज़ पाती है, तो उस का हज्ज सही है और (फ़रीज़ा अदा होने के लिए) काफ़ी है, लेकिन वह इस के लिए गुनाहगार है।
हज्ज के फ़ज़ाएल
हज्ज के फ़ज़ाएल तथा कल्याण में बहुत सी बातें आई हैं, उन में सेः
1- कि वह अफ़ज़ल आमाल में से है
नबी सल्लल्लाहु अलैहि से जब पूछा गया कि आमाल में सब से अफ़ज़ल कौन सा है? फ़रमायाः “अल्लाह और उस के रसूल पर ईमान।” पूछा गयाः फिर कौन सा? फ़रमायाः “अल्लाह के रास्ते में जिहाद।” पूछा गयाः फिर कौन सा? फ़रमायाः “हज्जे मबरूर।” {बुख़ारीः 1519, मुस्लिमः 83}
2- क्षमा के लिए एक महान मौसम है
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “जिस ने हज्ज किया और उस ने कोई फ़ुह्श और बेहूदा बात नहीं की और न अल्लाह की नाफ़रमानी की, तो वह इस तरह (गुनाहों से पाक हो कर) लौटता है जैसे आज ही उस की माँ ने उसे जना है।” {बुख़ारीः 1521, मुस्लिमः 1350}
3- आग से मुक्ति पाने का सुनहरा अवसर
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “कोई दिन ऐसा नहीं है जिस में अल्लाह तआला अरफ़े के दिन से ज़्यादा अपने बंदे को जहन्नम की आग से आज़ाद करता है।” {मुस्लिमः 1348}
4- उस का प्रतिफल स्वर्ग (बदला जन्नत) है
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “हज्जे मबरूर का बदला जन्नत ही है।” {बुख़ारीः 1773, मुस्लिमः 1349} ये फ़ज़ाएल आदि केवल उसी के लिए हैं जिस का इरादा सच्चा है, नीयत ठीक है, दिल शुद्ध है और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सही इत्तिबा है।
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