वर्तमान खंड: :मॉडल
पाठ महामारी संबंधी अहकाम व विधि विधान
बीमारी से पहले उस से बचाव के लिए वैक्सीन लगाना जायज़ है, और यह अल्लाह पर भरोसा करने के मुनाफ़ी (ख़िलाफ़) नहीं है। क्योंकि सहीह हदीस में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “जिस ने हर दिन सुबह के वक़्त सात अजवा खजूरें खा लीं, उसे उस दिन ज़हर नुक़सान पहुँचा सकेगी और न जादू।” {बुख़ारीः 5445, मुस्लिमः 2047} और यह विपत्ति के आने से पहले उसे दूर करने के वसायल में से है।
शरिअते इस्लामिया बीमारों को स्वस्थ लोगों के संपर्क से बचने का आग्रह करता है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “कोई शख़्स अपने बीमार ऊँटों को किसी के स्वस्थ ऊँटों में न ले जाये।” {बुख़ारीः 5771, मुस्लिमः 2221}
इस लिए वह एक संक्रामक रोग के रोगी के पास प्रवेश करने से दूर रहे, लेकिन बीमारी के प्रसार को रोकने के उपाय इख़्तियार करते हुये मुमकिन है कि उस के घर वाले उस की ज़ियारत करे, उस की ख़बर गीरी करे, उस के लिए दुआ करे और माल व जाह से जहाँ तक हो सके उस के इलाज में उस की मदद करे।
जिस देश में प्लेग है उस देश में प्रवेश करना या उस से निकलना जायज़ नहीं है। और इस की दलील अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित वह हदीस है, जिस में नबी अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “जब तुम किसी सरज़मीन में (वबा के मुतअल्लिक़) सुनो तो वहाँ न जाओ, और जब ऐसी जगह वबा आ जाये जहाँ तुम ख़ुद मौजूद हो तो वहाँ से मत निकलो।” {बुख़ारीः 5729, मुस्लिमः 2219} और यह जुमहूर उलमा की राय है कि जिस देश में इस तरह की महामारी आई हो, उस देश की यात्रा करना या बीमारी से बचने के लिए उसे छोड़ना जायज़ नहीं है।
पुरुषों के लिए बाजमाअत नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है, लेकिन विद्वानों ने उल्लेख किया है कि यह निर्भर योग्य (क़ाबिले क़बूल) उज़्र के कारण साक़ित (माफ़) हो जाती है। और यह आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की हदीस से प्रमाणित है कि जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बीमार पड़ गये तो मुसलमानों के साथ नमाज़ पढ़ने से पीछे रह गये, और कहा: "अबू बक्र को हुक्म दो कि वह लोगों को नमाज़ पढ़ायें।" (बुखारीः 664, मुस्लिमः 418)। पस यह इस बात का संकेत है कि यदि किसी मुसलमान को किसी स्पष्ट बीमारी या कठिनाई का उज़्र हो, तो उस के लिए मस्जिद में जमाअत को छोड़ कर अकेले नमाज़ पढ़ना जायज़ है।
जब किसी उज़्र के कारण मुस्लिम मस्जिद में नमाज़ जमाअत के साथ न पढ़ सके तो उस के लिए मुस्तहब है कि फ़र्ज़ के लिए और नफ़्ल के लिए भी अपने घर में एक मस्जिद बना ले। और यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़ों में से है। इतबान बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु की उस हदीस में है जिसे इमाम मुस्लिम ने रिवायत किया है कि उन्हों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा कि उन की दृष्टि दुर्बल है, और उन के तथा उन की क़ौम के बीच एक घाटी पड़ती है, लिहाज़ा जब बहाव आती है तो घाटी पार कर के मस्जिद तक जाने में असक्षम हैं। चुनांचि उन्हों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दरख़ास्त की कि आप उन के घर की ज़ियारत करें और उस में नमाज़ पढ़ें, ताकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नमाज़ पढ़ने की जगह को वह मुसल्ला बना लें। पस नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आये और उन के घर में दो रकअत नमाज़ पढ़ी।
इसी तरह, मैमूना रज़ियल्लाहु अन्हा के घर में एक मस्जिद थी, और अम्मार बिन यासिर के घर में भी एक मस्जिद थी। इस लिए हमें इन आपदाओं का लाभ उठाना चाहिए और अपने घरों में मस्जिदें बनानी चाहिए।
घरों में बाजमाअत नमाज़ पढ़ना मशरू है जब इसे मस्जिद में स्थापित करना संभव नहीं होता है, और जमाअत के साथ पढ़ने का सवाब मिल जाता है। कई सहाबीयों जैसे इब्ने मसऊद और अनस रज़ियल्लाहु अन्हुमा वग़ैरा से इमाम के साथ नमाज़ छूट जाने पर घर में बाजमाअत नमाज़ पढ़ने का सुबूत मिलता है।
जब घर में जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ी जाये, तो घर का मालिक इमामत का ज़्यादा हक़दार है। पस अगर वह इमामत के लिए आगे न बढ़े तो अल्लाह की किताब का ज़्यादा याद रखने वाला। और अगर इस में सब बराबर हों तो नमाज़ के अहकामात का ज़्यादा जानकार, और अगर इस में भी बराबर हों तो उम्र में सब से बड़ा।
जब मुसलमान अपने घर में नमाज़ पढ़े, यदि मुक़्तदी पुरुष है, तो सुन्नत यह है कि वह उस के दायें खड़ा हो अगर अकेला है तो, और अगर एकाधिक है तो उस के पीछे खड़े हूँ। और यदि मुक़्तदी महिला है, तो सुन्नत है कि वह पीछे खड़ी हो। और यदि पुरुष व महिला दोनों हैं, तो पुरुष इमाम के पीछे और महिलायें उन के पीछे खड़ी होंगी।
ये विपत्तियाँ हमारे लिए एक बड़ा अवसर है, ताकि हम अपने परिवार को नमाज़ का तरीक़ा तथा उस की शर्तें और पवित्रता का विधान तथा इन से संबंधित आवश्यक चीज़ें सिखायें और हम इस पर उन से परामर्श करें।
औरतों का घरों में बाजमाअत नमाज़ पढ़ना मसनून है। क्योंकि यह उम्मे वरक़ा, आइशा और उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हुन्न से साबित है। और उन के जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने में बड़ी फ़ज़ीलत है और अल्लाह की तरफ़ से अज्र व सवाब है। और उन की इमाम सफ़ के बीच में खड़ी हूँगी।
संक्रामक महामारी से संक्रमित व्यक्ति के लिए लोगों की सभाओं में शामिल होना हराम है, क्योंकि इस से लोगों को हानि होती है। अल्लाह तआला फ़रमाता हैः ﴿وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ بِغَيْرِ مَا اكْتَسَبُوا فَقَدِ احْتَمَلُوا بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُّبِينًا﴾. (الأحزاب: 58). “और जो लोग मुमिन मर्दों और मुमिन औरतों को तकलीफ़ देते हैं बग़ैर किसी गुनाह के जो उन्हों ने कमाया हो तो यक़ीनन् उन्हों ने बड़े बुहतान और स्पष्ट गुनाह का बोझ उठाया।” {अल-अहज़ाबः 58}
और स्थापित शरई नियमों में से है: न तो कोई नुकसान पहुँचाना जायज़ है और न ही नुक़सान पहुँचाने का सबब बनना जायज़ है। इस लिए जिस व्यक्ति को यह बीमारी है, उसे स्वस्थ लोगों के साथ घुलना-मिलना जायज़ नहीं है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “कोई शख़्स अपने बीमार ऊटों को किसी सेहतमंद ऊँटों में न ले जाये।” {बुख़ारीः 5771, मुस्लिमः 2221}
नमाज़ के दौरान नमाज़ अदा करने वाले के लिए अपना मुंह ढाँकना मकरूह होता है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस से मना फ़रमाया है, लेकिन जरूरत पड़ने पर या संक्रमण से नुकसान के डर से वह इस तरह के मुखौटे पहन सकता है।
नमाज़ बाजमाअत बाधित होने की स्तिथि में, जुमे के दिन के बाक़ी अहकाम बने रहते हैं। पस फ़ज्र की नमाज़ में सूरह अस्सजदा और अल-इंसान का पढ़ना, अस्र के बाद आख़िरी घड़ी में दुआ क़बूल होने के वक़्त में दुआ करना, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उस बकसरत दुरूद पढ़ना और सूरतुल् कह्फ़ की तिलावत करना मसनून है, क्योंकि मूलतः यह अहकाम मशरू और मसनून हैं, यह जुमे की नमाज़ के अधीन नहीं हैं।
हथेली से हथेली मिला कर मुसाफ़हा करना सुन्नत है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमायाः “जब दो मुसलमान आपस में मिलते और दोनों एक दूसरे से मुसाफ़हा करते हैं तो उन दोनों के एक दूसरे से अलग होने से पहले ही उन की मग़फ़िरत हो जाती है।” {अबू दाऊदः 5212} पस अगर मुसलमान को हाथ मिलाने से संक्रमण का डर हो, तो वह मौखिक सलाम करने पर बस करे। और आशा की जाती है कि अल्लाह के हुक्म से उन के लिए मुसाफ़हा का सवाब लिखा जायेगा।
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